Tuesday, September 27, 2016

“We don't see things as they are, we see them as we are.”
― Anaïs Nin
“I, with a deeper instinct, choose a man who compels my strength, who makes enormous demands on me, who does not doubt my courage or my toughness, who does not believe me naïve or innocent, who has the courage to treat me like a woman.”
― Anaïs Nin
“Love never dies a natural death. It dies because we don't know how to replenish its source. It dies of blindness and errors and betrayals. It dies of illness and wounds; it dies of weariness, of witherings, of tarnishings.”
― Anaïs Nin

Sunday, January 10, 2016

कितना अच्छा होता है एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है,... उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं। शब्दों की खोज शुरु होते ही हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं और उनके पकड़ में आते ही एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं। हर जानकारी में बहुत गहरे ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है, कुछ भी ठीक से जान लेना खुद से दुश्मनी ठान लेना है। कितना अच्छा होता है एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना, और अपने ही भीतर दूसरे को पा लेना।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

ਈਰਾਨੀ ਸ਼ਾਇਰਾ ਸੀਮਾ ਯਾਰੀ ਦੀ ਇਕ ਪ੍ਰੇਮ-ਕਵਿਤਾ

ਇਹ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਆਖਦੀ -
ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਕਰਦੀ ਹਾਂ ਪਿਆਰ ਹਾਲਾਂਕਿ ਮੈਂ ਕੀਤਾ ਪਿਆਰ ਮੈਂ ਆਖਿਆ - "ਧਿਆਨ ਰੱਖੀਂ, ਆਪਣੀਆਂ ਚਾਬੀਆਂ ਅੰਦਰ ਹੀ ਨਾ ਭੁੱਲ ਜਾਵੀਂ ਪੌੜੀਆਂ ਤੋਂ ਸੰਭਲ ਕੇ ਉਤਰੀਂ - ਬੜੀ ਤਿਲਕਣ ਏ ਆਪਣਾ ਖਿਆਲ ਰੱਖੀਂ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤੇ ਲਾਲ ਬੱਤੀ 'ਤੇ ਓਦੋਂ ਤਕ ਰੁਕਿਆ ਰਹੀਂ ਜਦੋਂ ਤਕ ਹਰੀ ਨਾ ਹੋ ਜਾਏ....
“No mistake about it. Ice is cold; roses are red; I'm in love. And this love is about to carry me off somewhere. The current's too overpowering; I don't have any choice. It may very well be a special place, some place I've never seen before. Danger may be lurking there, something that may end up wounding me deeply, fatally. I might end up losing everything. But there's no turning back. I can only go with the flow. Even if it means I'll be burned up, gone forever.” ― Haruki Murakami, Sputnik Sweetheart

"...don't marry suffering. Some people do. They get married to it, and sleep and eat together, just as husband and wife.. If they go with joy they think it's adultery..." -- Saul Bellow

"We shouldn’t be afraid of difficult films, we shouldn’t be afraid not to be entertained.”
-- Aleksandr Sokurov



ਇਕ ਈਰਾਨੀ ਗੀਤ

ਉਸਨੂੰ ਪੈਗਾਮ ਮਿਲਿਆ.... " ਕਰਾਰਾਂ ਵਾਲੀਏ , ਮੈਂ ਪੰਧ ਚੀਰ ਕੇ ਔਣਾ ਦੱਸ ਕੀ ਲਿਆਵਾਂ ? ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਪਰਵਾਨ ਹੋਵੇ ਤੇ ਤੇਰੀ ਨਿਗਾਹ - ਕੁਝ ਮਿਹਰਬਾਨ ਹੋਵੇ...." ਤੇ ਉਸਨੇ ਕਿਹਾ - " ਕਰਾਰਾਂ ਵਾਲਿਆ , ਮੈਨੂੰ ਇਕ ਬਾਰੀ ਲਿਆ ਦੇ .. ਮੈਂ ਅੰਬਰ ਵੇਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ.. ਤੇ ਇਹ ਜੁ ਕੰਧਾਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਇਕ ਬਾਰੀ ਮੰਗਦੀਆਂ......."

ਜਯੂਨੀ ਤਕਾਮੀ ਦੀ ਜਾਪਾਨੀ ਕਵਿਤਾ

ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਦਿਆਂ...
ਮੈਂ ਲਿਖਦੀ ਹਾਂ ਚੰਗਾ ਆਮਲੇਟ ਖਾਂਦੀ ਹਾਂ ਗਰਮ ਕਵਿਤਾ ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਦਿਆਂ...
ਕਾਰ ਦੇ ਕਰਦੀ ਹਾਂ ਬਟਨ ਬੰਦ ਚਲਾਉਂਦੀ ਹਾਂ ਕੋਟ, ਮੀਂਹ 'ਚ ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਦਿਆਂ
ਲਾਲ ਬੱਤੀ 'ਤੇ ਤੁਰ ਪੈਂਦੀ ਹਾਂ ਤੇ ਹਰੀ 'ਤੇ ਖੜੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹਾਂ ਕਿਸੇ ਥਾਂ ਤੈਰ ਰਹੀ ਹਾਂ ਇਥੇ ਉਥੇ ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਦਿਆਂ
ਜੂੜਾ ਕਰਦੀ ਹਾਂ ਬਿਸਤਰੇ ਦਾ ਤੇ ਵਿਛਾ ਦਿੰਦੀ ਹਾਂ ਕੇਸ ਆਪਣੇ ਪਰਵਾਹ ਨਹੀਂ ਕਿਸੇ ਦੀ ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਦਿਆਂ....

ਗੁੱਤ

ਲਿਜਾਈਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਸਭ ਔਰਤਾਂ ਦੇ,
ਜਦ ਸਿਰ ਮੁੰਨ ਦਿੱਤੇ ਗਏ..
ਤਾਂ ਚਾਰ ਆਦਮੀਆਂ ਨੇ ਝਾੜੂਆਂ ਨਾਲ
ਇਕ ਥਾਂ ਹੂੰਝ ਦਿੱਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਵਾਲ..
ਗੈਸ ਕੋਠੜੀਆਂ 'ਚ ਜਿਹਨਾਂ ਦੇ ਦਮ ਘੁਟੇ,
ਸਾਫ ਸ਼ੀਸ਼ਿਆਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਪਏ ਹਨ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਵਾਲ..
ਤੇ ਵਾਲਾਂ 'ਚ ਫਸੀਆਂ, ਛੋਟੀਆਂ-ਛੋਟੀਆਂ ਕੰਘੀਆਂ ਤੇ ਕਲਿੱਪ
ਉਹਨਾਂ ਵਾਲਾਂ 'ਚ ਹੁਣ ਧੁੱਪ ਨਹੀਂ ਖੇਡਦੀ
ਨਾ ਉਹ ਹਵਾ ਵਿਚ ਉਡਦੇ ਹਨ...
ਨਾ ਉਹਨਾਂ 'ਚ ਕੋਈ ਉਂਗਲੀਆਂ ਫਿਰਦੀਆਂ ਹਨ ਹੌਲੀ ਹੌਲੀ
ਨਾ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਮੀਂਹ ਛੂੰਹਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਬੁੱਲ
ਵੱਡੇ ਵੱਡੇ ਬਕਸਿਆਂ 'ਚ ਪਏ ਹਨ
ਰੁੱਖੇ ਵਾਲਾਂ ਦੇ ਚਿੱਟੇ ਅੰਬਾਰ
ਤੇ ਉਹਨਾਂ 'ਚ , ਉਹ ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ ਗੁੱਤ -
ਇਕ ਰਿਬਨ ਨਾਲ ਬੰਨੀ, ਜਿਸਦਾ ਰੰਗ ਉੱਡ ਗਿਆ ਹੋਇਆ...
ਉਹ ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ ਗੁੱਤ
ਜਿਹਨੂੰ ਕਦੇ ਖਿਚਦੇ ਹੋਣਗੇ ,
ਸਕੂਲ ਦੇ ਸ਼ਰਾਰਤੀ ਮੁੰਡੇ......

Sunday, May 10, 2015

ਹਾਦਸੇ ਤੇ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ

ਮੈਨੂੰ ਕੇਵਲ
ਹਾਦਸੇ ਦੇਖਣ ਦੀ
ਆਦਤ ਪੈ ਗਈ ਹੈ
ਮੇਰੀ ਬਾਰੀ ਦੇ ਬਾਹਰ
ਖੜ੍ਹਾ ਰੁੱਖ ਮੈਨੂੰ
ਓਦੋਂ ਤੀਕ ਨਹੀਂ ਦਿਸਦਾ
ਜਦੋਂ ਤੱਕ
ਉਸ ਉੱਤੇ ਬਿਜ਼ਲੀ ਨਹੀਂ ਡਿਗਦੀ .. 

Navtej Bharati
ਏਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ
ਕਿ ਮੈਂ ਬਚਦੀ ਖੁਚਦੀ ਇਕ ਅੱਧ ਯਾਰੀ ਉਤੇ ਵੀ
ਫੌੜੀਆਂ ਹੋਣ ਦਾ ਇਲਜ਼ਾਮ ਧਰ ਕੇ
ਉਲ੍ਹਾਮੇ ਵਰਗੀ ਫਕੀਰੀ 'ਚ ਬਦਲ ਜਾਵਾਂ
ਜਾਂ ਗੁੰਮਨਾਮ ਪਰਦੇਸੀ ਹੋ ਜਾਵਾਂ
ਤੂੰ ਪਰਤ ਆ
 - ਪ੍ਰਮਿੰਦਰ ਸੋਢੀ
दिल में कुछ और, जुबां पे कुछ और बात करता हैं ,
खंजर हाथ में लिए हुए मोहब्बत की बात करता हैं !
सुना है मैने प्यार, दोस्ती - वफ़ा सब अमीरो की ज़ागीर है,
मै खाली जेबें टटोलता हुँ, वो बिछड़ने की बात करता है !!
लाज़िमी हैं उसका मुझसे यूँ खफ़ा होना भी ,
मैं शिद्द्त से उसे चाहता हूँ वो बनावट की बात करता हैं !
उन्हें शिक़ायत है मेरे गुफ्तगू के तरीको से,
मुझे ख़ामोशी हैं पसंद, वो अल्फ़ाजों से बात करता हैं !!
हुनरमन्द हैं वो जो हैं खुद को बदलने की फिक्र में " रेहान ",
नादान हैं वो जो ज़माने को बदलने की बात करता हैं ....!!!!
-चंद्रेश सिंदल "रेहान"
ਲੈ ! ਮੈਂ ਬੰਦ ਕਰਦਾ ਹਾਂ
ਇਹ ਕਥਾ
ਸੌਗੰਧ ਖਾਂਦਾ ਹਾਂ ਧੜਕਦੇ ਪੱਥਰ ਤੇ ਹੱਥ ਰੱਖਕੇ
ਕਿ ਮੈਂ ਤੇਰੇ ਸਾਹਾਂ ’ਚ ਜਿਹੜੀ ਖਲਬਲੀ ਛੱਡੀ ਸੀ
ਉਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਾਹਾਂ ’ਚ ਵਾਪਸ ਲੈਂਦਾ ਹਾਂ।  

-ਜਸਵੰਤ ਦੀਦ
याद है इक दिन
मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे
सिगरेट की डिबिया पर तुमने
एक स्केच बनाया था
आकर देखो
उस पौधे पर फूल आया है !
-Gulzar

Munnawar Rana about Maa

गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मेरा खुलूस तो पूरब के गाँव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएँ बुझ गईं
वो मैला—सा बोसीदा—सा आँचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है

Wednesday, March 4, 2015

तुम अगर नहीं आयीं, गीत गा ना पाऊँगा|
साँस साथ छोडेगी, सुर सजा ना पाऊँगा|
तान भावना की है, शब्द-शब्द दर्पण है,
बाँसुरी चली आओ, होट का निमन्त्रण है|
तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है,
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है|
दूरियाँ समझती हैं दर्द कैसे सहना है?
आँख लाख चाहे पर होठ को ना कहना है|
औषधी चली आओ, चोट का निमन्त्रण है,
बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है|
तुम अलग हुयीं मुझसे साँस की खताओं से,
भूख की दलीलों से, वक़्त की सजाओं ने|
रात की उदासी को, आँसुओं ने झेला है,
कुछ गलत ना कर बैठे मन बहुत अकेला है|
कंचनी कसौटी को खोट ना निमन्त्रण है|
बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है|
सब तमन्नाएँ हों पूरी, कोई ख्वाहिश भी रहे
चाहता वो है, मुहब्बत में नुमाइश भी रहे

आसमाँ चूमे मेरे पँख तेरी रहमत से
और किसी पेड की डाली पर रिहाइश भी रहे

उसने सौंपा नही मुझे मेरे हिस्से का वजूद
उसकी कोशिश है की मुझसे मेरी रंजिश भी रहे

मुझको मालूम है मेरा है वो मै उसका हूँ 
उसकी चाहत है की रस्मों की ये बंदिश भी रहे

मौसमों में रहे 'विश्वास' के कुछ ऐसे रिश्ते
कुछ अदावत भी रहे थोडी नवाज़िश भी रहे
है नमन उनको कि जो यशकाय को अमरत्व देकर
इस जगत के शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं 
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय 
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं 
है नमन उस देहरी को जिस पर तुम खेले कन्हैया 
घर तुम्हारे परम तप की राजधानी हो गये हैं 
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय ....
हमने भेजे हैं सिकन्दर सिर झुकाए मात खाऐ 
हमसे भिड़ते हैं वो जिनका मन धरा से भर गया है 
नर्क में तुम पूछना अपने बुजुर्गों से कभी भी 
सिंह के दाँतों से गिनती सीखने वालों के आगे 
शीश देने की कला में क्या गजब है क्या नया है 
जूझना यमराज से आदत पुरानी है हमारी 
उत्तरों की खोज में फिर एक नचिकेता गया है 
है नमन उनको कि जिनकी अग्नि से हारा प्रभंजन 
काल कौतुक जिनके आगे पानी पानी हो गये हैं 
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय 
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं 
लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे 
विजय के उदघोष, गीता के कथन तुमको नमन है 
राखियों की प्रतीक्षा, सिन्दूरदानों की व्यथाऒं 
देशहित प्रतिबद्ध यौवन के सपन तुमको नमन है 
बहन के विश्वास भाई के सखा कुल के सहारे 
पिता के व्रत के फलित माँ के नयन तुमको नमन है 
है नमन उनको कि जिनको काल पाकर हुआ पावन 
शिखर जिनके चरण छूकर और मानी हो गये हैं
कंचनी तन, चन्दनी मन, आह, आँसू, प्यार, सपने
राष्ट्र के हित कर चले सब कुछ हवन तुमको नमन है 
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय 
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये
फिर पुराने नीम के नीचे खडा हूँ

फिर पिता की याद आई है मुझे

नीम सी यादें ह्रदय में चुप समेटे

चारपाई डाल आँगन बीच लेटे

सोचते हैं हित सदा उनके घरों का

दूर है जो एक बेटी चार बेटे

फिर कोई रख हाथ काँधे पर 

कहीं यह पूछता है-

"क्यूँ अकेला हूँ भरी इस भीड मे" 

मै रो पडा हूँ

फिर पिता की याद आई है मुझे

फिर पुराने नीम के नीचे खडा हूँ
चेहरे पर चँचल लट उलझी, आँखों में सपन सुहाने हैं
ये वही पुरानी राहें हैं, ये दिन भी वही पुराने हैं

कुछ तुम भूली कुछ मैं भूला मंज़िल फिर से आसान हुई
हम मिले अचानक जैसे फिर पहली पहली पहचान हुई
आँखों ने पुनः पढी आँखें, न शिकवे हैं न ताने हैं
चेहरे पर चँचल लट उलझी, आँखों में सपन सुहाने हैं

तुमने शाने पर सिर रखकर, जब देखा फिर से एक बार
जुड़ गया पुरानी वीणा का, जो टूट गया था एक तार
फिर वही साज़ धडकन वाला फिर वही मिलन के गाने हैं
चेहरे पर चँचल लट उलझी, आँखों मे सपन सुहाने हैं


आओ हम दोनों की सांसों का एक वही आधार रहे
सपने, उम्मीदें, प्यास मिटे, बस प्यार रहे बस प्यार रहे
बस प्यार अमर है दुनिया मे सब रिश्ते आने-जाने हैं
चेहरे पर चँचल लट उलझी, आँखों मे सपन सुहाने हैं
मैं तुम्हें अधिकार दूँगा
एक अनसूंघे सुमन की गन्ध सा 
मैं अपरिमित प्यार दूँगा
मैं तुम्हें अधिकार दूँगा

सत्य मेरे जानने का
गीत अपने मानने का
कुछ सजल भ्रम पालने का
मैं सबल आधार दूँगा
मैं तुम्हे अधिकार दूँगा

ईश को देती चुनौती,
वारती शत-स्वर्ण मोती
अर्चना की शुभ्र ज्योति
मैं तुम्हीं पर वार दूँगा
मैं तुम्हें अधिकार दूँगा

तुम कि ज्यों भागीरथी जल
सार जीवन का कोई पल
क्षीर सागर का कमल दल
क्या अनघ उपहार दूँगा
मै तुम्हें अधिकार दूँगा
सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी
होठों के संग नयनों को कुछ भाषाएँ देनी होंगी
हर विवश आँख के आँसू को
यूँ ही हँस हँस पीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा

मनमोहन के आकर्षण मे भूली भटकी राधाओं की
हर अभिशापित वैदेही को पथ मे मिलती बाधाओं की
दे प्राण देह का मोह छुड़ाओं वाली हाड़ा रानी की
मीराओं की आँखों से झरते गंगाजल से पानी की
मुझको ही कथा सँजोनी है,
मुझको ही व्यथा पिरोनी है
स्मृतियाँ घाव भले ही दें
मुझको उनको सीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा

जो सूरज को पिघलाती है व्याकुल उन साँसों को देखूँ
या सतरंगी परिधानों पर मिटती इन प्यासों को देखूँ
देखूँ आँसू की कीमत पर मुस्कानों के सौदे होते
या फूलों के हित औरों के पथ मे देखूँ काँटे बोते
इन द्रौपदियों के चीरों से
हर क्रौंच-वधिक के तीरों से
सारा जग बच जाएगा पर
छलनी मेरा सीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा

कलरव ने सूनापन सौंपा मुझको अभाव से भाव मिले
पीड़ाओं से मुस्कान मिली हँसते फूलों से घाव मिले
सरिताओं की मन्थर गति मे मैंने आशा का गीत सुना
शैलों पर झरते मेघों में मैने जीवन-संगीत सुना
पीड़ा की इस मधुशाला में
आँसू की खारी हाला में
तन-मन जो आज डुबो देगा
वह ही युग का मीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा
बादड़ियो गगरिया भर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे
प्यासे तन-मन-जीवन को
इस बार तो तू तर कर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे

अंबर से अमृत बरसे 
तू बैठ महल मे तरसे
प्यासा ही मर जाएगा
बाहर तो आजा घर से
इस बार समन्दर अपना
बूँदों के हवाले कर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे

सबकी अरदास पता है 
रब को सब खास पता है
जो पानी में घुल जाए
बस उसको प्यास पता है
बूँदों की लड़ी बिखरा दे
आँगन मे उजाले कर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे

प्यासे तन-मन-जीवन को
इस बार तू तर कर दे
बादड़ियो गगरिया भर दे
सूरज पर प्रतिबंध अनेकों 
और भरोसा रातों पर
नयन हमारे सीख रहे हैं 
हँसना झूठी बातों पर

हमने जीवन की चौसर पर 
दाँव लगाए आँसू वाले
कुछ लोगों ने हर पल, हर दिन 
मौके देखे बदले पाले
हम शंकित सच पा अपने, 
वे मुग्ध स्वयं की घातों पर
नयन हमारे सीख रहे हैं 
हँसना झूठी बातों पर

हम तक आकर लौट गई हैं 
मौसम की बेशर्म कृपाएँ
हमने सेहरे के संग बाँधी 
अपनी सब मासूम खताएँ
हमने कभी न रखा स्वयं को 
अवसर के अनुपातों पर
नयन हमारे सीख रहे हैं 
हँसना झूठी बातों पर
उनकी ख़ैरो-ख़बर नही मिलती
हमको ही खासकर नही मिलती

शायरी को नज़र नही मिलती
मुझको तू ही अगर नही मिलती

रूह मे, दिल में, जिस्म में, दुनिया
ढूंढता हूँ मगर नही मिलती

लोग कहते हैं रुह बिकती है
मै जिधर हूँ उधर नही मिलती

Dr. Kumar VIshwas in Hindi

आना तुम मेरे घर 
अधरों पर हास लिये
तन-मन की धरती पर 
झर-झर-झर-झर-झरना
साँसों मे प्रश्नों का आकुल आकाश लिये

तुमको पथ में कुछ मर्यादाएँ रोकेंगी
जानी-अनजानी सौ बाधाएँ रोकेंगी
लेकिन तुम चन्दन सी, सुरभित कस्तूरी सी
पावस की रिमझिम सी, मादक मजबूरी सी
सारी बाधाएँ तज, बल खाती नदिया बन
मेरे तट आना 
एक भीगा उल्लास लिये
आना तुम मेरे घर 
अधरों पर हास लिये

जब तुम आओगी तो घर आँगन नाचेगा
अनुबन्धित तन होगा लेकिन मन नाचेगा
माँ के आशीषों-सी, भाभी की बिंदिया-सी
बापू के चरणों-सी, बहना की निंदिया-सी
कोमल-कोमल, श्यामल-श्यामल, अरूणिम-अरुणिम 
पायल की ध्वनियों में 
गुंजित मधुमास लिये
आना तुम मेरे घर 
अधरों पर हास लिये

Dr. Kumar Vishwas's Poetry in Hindi

ओ प्रीत भरे संगीत भरे!
ओ मेरे पहले प्यार!
मुझे तू याद न आया कर
ओ शक्ति भरे अनुरक्ति भरे!
नस-नस के पहले ज्वार!
मुझे तू याद न आया कर।

पावस की प्रथम फुहारों से 
जिसने मुझको कुछ बोल दिये
मेरे आँसु मुस्कानों की
कीमत पर जिसने तोल दिये

जिसने अहसास दिया मुझको 
मै अम्बर तक उठ सकता हूं
जिसने खुद को बाँधा लेकिन 
मेरे सब बंधन खोल दिये

ओ अनजाने आकर्षण से!
ओ पावन मधुर समर्पण से!
मेरे गीतों के सार 
मुझे तू याद न आया कर।

मूझे पता चला मधुरे तू भी पागल बन रोती है,
जो पीङा मेरे अंतर में तेरे दिल में भी होती है
लेकिन इन बातों से किंचिंत भी अपना धैर्य नहीं खोना
मेरे मन की सीपी में अब तक तेरे मन का मोती है,

ओ सहज सरल पलकों वाले! 
ओ कुंचित घन अलकों वाले!
हँसते गाते स्वीकार 
मुझे तू याद न आया कर।
ओ मेरे पहले प्यार 
मुझे तू याद न आया कर

Dr. Kumar Vishwas's Poetry in Hindi

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन||1|| 

जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है,
जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है.
झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर,
तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है||2||

जो धरती से अम्बर जोड़े, उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े, उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो,जाती है हर उमर मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े, उसका नाम मोहब्बत है||3||

बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया
रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नहीं पायी कभी मैं कह नहीं पाया||4||

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ||5||

पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश में है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या||6||

समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता||7||

पुकारे आँख में चढ़कर तो खू को खू समझता है,
अँधेरा किसको को कहते हैं ये बस जुगनू समझता है,
हमें तो चाँद तारों में भी तेरा रूप दिखता है,
मोहब्बत में नुमाइश को अदाएं तू समझता है||8|| 

गिरेबां चाक करना क्या है, सीना और मुश्किल है,
हर एक पल मुस्काराकर अश्क पीना और मुश्किल है 
हमारी बदनसीबी ने हमें इतना सिखाया है,
किसी के इश्क में मरने से जीना और मुश्किल है||9||

मेरा अपना तजुर्बा है तुम्हें बतला रहा हूँ मैं 
कोई लब छू गया था तब अभी तक गा रहा हूँ मैं 
फिराके यार में कैसे जिया जाये बिना तड़पे 
जो मैं खुद ही नहीं समझा वही समझा रहा हूँ मैं||10||

किसी पत्थर में मूरत है कोई पत्थर की मूरत है 
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी ख़ूबसूरत है 
ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है 
तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है||11||